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उत्तर प्रदेश का इतिहास, कला और संस्कृति | Indian History | General Studies I

 विषयसूची 

  • उन्नीसवीं सदी में उत्तर प्रदेश में पुनर्जागरण के स्वरूप पर प्रकाश डालिए। ( UPPSC 2022)
  • उत्तर प्रदेश में मनाने जाने वाले विभिन्न त्योहारों का उल्लेख कीजिए। ( UPPSC 2022)
  • उत्तर प्रदेश के "पूर्वांचल क्षेत्र" में प्रचलित प्रमुख लोक गीतों का विवरण प्रस्तुत करते हुए उनकी विशेषताओं को उल्लिखित कीजिए। ( UPPSC 2022)
  • उत्तर प्रदेश की क्रांतिकारियों का भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष संघर्ष में योगदानों का मूल्यांकन कीजिए।  ( UPPSC 2021)


प्रश्न।

उन्नीसवीं सदी में उत्तर प्रदेश में पुनर्जागरण के स्वरूप पर प्रकाश डालिए।

( UPPSC General Studies I, 2022)

उत्तर।

भारतीय पुनर्जागरण को सामाजिक-बौद्धिक क्रांति के रूप में भी जाना जाता है, इसका उद्देश्य विज्ञान, साहित्य, सामाजिक मानदंडों और दर्शन में परिवर्तन करना था। महत्वपूर्ण भारतीय पुनर्जागरण और धार्मिक और सामाजिक सुधारकों में स्वामी विवेकानन्द, राजा राम मोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, ज्योतिराव गोविंदराव फुले और कई अन्य शामिल थे।


19वीं शताब्दी के दौरान उत्तर प्रदेश में पुनर्जागरण एक सांस्कृतिक और बौद्धिक जागृति थी जिसमें कला, साहित्य, सामाजिक सुधार का पुनरुत्थान और भारत की विरासत की पुनः खोज शामिल थी। उत्तर प्रदेश में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की उपस्थिति ने पश्चिमी शिक्षा के संपर्क को बढ़ावा दिया और विचारों ने उस समय के बौद्धिक माहौल को प्रभावित किया।


19वीं शताब्दी में उत्तर प्रदेश में पुनर्जागरण की प्रकृति के कुछ प्रमुख पहलू इस प्रकार हैं:


साहित्यिक पुनरुद्धार:

19वीं सदी के उत्तर प्रदेश पुनर्जागरण में हिंदी, उर्दू और फ़ारसी सहित विभिन्न भाषाओं में साहित्यिक आंदोलनों का विकास हुआ। मिर्ज़ा ग़ालिब, मुंशी प्रेमचंद और भारतेंदु हरिश्चंद्र जैसे प्रमुख कवियों और लेखकों ने साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया।


हिंदी साहित्य:

भारतेंदु हरिश्चंद्र, जिन्हें अक्सर "आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक" कहा जाता है, ने हिंदी को एक साहित्यिक भाषा के रूप में बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


उर्दू शायरी:

सबसे प्रसिद्ध उर्दू कवियों में से एक, मिर्ज़ा ग़ालिब ने उर्दू शायरी की समृद्ध परंपरा में योगदान देते हुए, कालजयी कृतियाँ बनाईं जो आज भी पूजनीय हैं।


सांस्कृतिक पुनरुद्धार:

भारत की शास्त्रीय विरासत में एक नई रुचि पैदा हुई। संस्कृत साहित्य और प्राचीन भारतीय दर्शन का अध्ययन और सराहना की गई, जिससे भारतीय सांस्कृतिक जड़ों की पुनः खोज हुई।


राजनीतिक जागृति:

19वीं सदी में राजनीतिक जागरूकता और राष्ट्रवादी भावनाओं का भी उदय हुआ। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई और कुँवर सिंह जैसे नेताओं ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाईं।


कलात्मक अभिव्यक्ति:

इस अवधि में चित्रकला और संगीत सहित विभिन्न कला रूपों में प्रगति देखी गई। लखनऊ चित्रकला शैली, जो अपने जटिल विवरण और परिष्कार के लिए जानी जाती है, ने प्रमुखता प्राप्त की।


शैक्षिक सुधार:

शिक्षा और बौद्धिक विकास को बढ़ावा देने के लिए स्कूल और कॉलेज स्थापित करने की पहल की गई।


संक्षेप में, 19वीं शताब्दी के दौरान उत्तर प्रदेश में पुनर्जागरण एक बहुआयामी सांस्कृतिक और बौद्धिक आंदोलन था जिसने साहित्य, कला और सामाजिक सुधारों के कायाकल्प में योगदान दिया। इसने क्षेत्र के सांस्कृतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ा और आधुनिक भारत की बौद्धिक और कलात्मक विरासत की नींव रखी।



प्रश्न।

उत्तर प्रदेश में मनाने जाने वाले विभिन्न त्योहारों का उल्लेख कीजिए।

( UPPSC General Studies I, 2022)

उत्तर।

उत्तर प्रदेश भारत का एक विविध संस्कृति और समृद्ध विरासत वाला राज्य है, जो पूरे वर्ष त्योहारों की एक विस्तृत श्रृंखला मनाता है।


उत्तर प्रदेश में मनाये जाने वाले कुछ प्रमुख त्यौहार निम्नलिखित हैं:


दिवाली:

रोशनी का त्योहार दिवाली उत्तर प्रदेश में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। घरों और सड़कों को दीपों से रोशन किया जाता है और लोग मिठाइयाँ और उपहारों का आदान-प्रदान करते हैं। भगवान राम की जन्मस्थली अयोध्या अपने भव्य दिवाली समारोह के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है।


होली:

रंगों का त्योहार होली उत्तर प्रदेश के सबसे जीवंत त्योहारों में से एक है। लोग रंगीन पाउडर और जल के साथ खेलते हैं, गाते हैं और नृत्य करते हैं और उत्सव की मिठाइयों का आनंद लेते हैं। भगवान कृष्ण से जुड़े मथुरा और वृन्दावन अपने होली उत्सव के लिए प्रसिद्ध हैं।


जन्माष्टमी:

मथुरा और वृन्दावन में भगवान कृष्ण का जन्म बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। भक्त उपवास करते हैं, भक्ति गीत गाते हैं और कृष्ण के जीवन के प्रसंगों को दोहराते हैं।


ईद:

उत्तर प्रदेश में मुसलमान विशेष प्रार्थनाओं, दावतों और उपहारों के आदान-प्रदान के साथ ईद-उल-फितर और ईद-उल-अधा मनाते हैं।


नवरात्रि और दुर्गा पूजा:

देवी दुर्गा को समर्पित नौ रातों का त्योहार, नवरात्रि, भक्ति गीतों और नृत्य (गरबा और डांडिया) के साथ मनाया जाता है। दुर्गा पूजा को भव्य जुलूसों और मूर्ति विसर्जन के साथ भी मनाया जाता है।


महाशिवरात्रि:

भगवान शिव के भक्त, विशेष रूप से वाराणसी जैसे शहरों में, उपवास, रात्रि जागरण और शिव मंदिरों के दर्शन के साथ महाशिवरात्रि मनाते हैं।


रक्षाबंधन:

रक्षा बंधन का त्योहार भाइयों और बहनों के बीच के बंधन का जश्न मनाता है। बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी (एक सजावटी धागा) बांधती हैं, और भाई बदले में उपहार देते हैं।


मकर संक्रांति:

मकर संक्रांति को फसल उत्सव के रूप में मनाया जाता है। मकर संक्रांति में पतंग उड़ाना, तिल-गुड़ जैसी पारंपरिक मिठाइयों का आनंद लेना और नदियों में पवित्र स्नान करना शामिल है, खासकर कुंभ मेले के दौरान प्रयागराज में।


गंगा दशहरा:

यह त्यौहार गंगा नदी के पृथ्वी पर अवतरण का जश्न मनाता है। भक्त गंगा में पवित्र डुबकी लगाते हैं और इसके तटों पर अनुष्ठान करते हैं, विशेष रूप से वाराणसी और प्रयागराज जैसे स्थानों में।


ये उत्तर प्रदेश में मनाए जाने वाले कई त्योहारों के कुछ उदाहरण हैं, जो राज्य की सांस्कृतिक विविधता और गहरी परंपराओं को दर्शाते हैं। प्रत्येक त्योहार समुदायों को एक साथ लाता है और राज्य के सामाजिक ताने-बाने में जीवंतता जोड़ता है।


प्रश्न।

उत्तर प्रदेश के "पूर्वांचल क्षेत्र" में प्रचलित प्रमुख लोक गीतों का विवरण प्रस्तुत करते हुए उनकी विशेषताओं को उल्लिखित कीजिए। 

( UPPSC General Studies I, 2022)

उत्तर।

उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल क्षेत्र राज्य के पूर्वी भाग में स्थित है। सोनभद्र, मिर्ज़ापुर, वाराणसी, प्रयागराज, बलिया, सिद्धार्थ नगर, देवराई, मऊ, कुशी नगर, जौनपुर, ग़ाज़ीपुर और गोरखपुर उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र के कुछ महत्वपूर्ण जिले हैं।


उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल क्षेत्र लोक गीतों की जीवंत परंपरा सहित अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है। पूर्वांचल के लोक गीत क्षेत्र की विविध संस्कृति, परंपराओं और ग्रामीण जीवन को दर्शाते हैं।


लोक गीतों में गीतों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है जो क्षेत्र के दैनिक जीवन, रीति-रिवाजों और सामाजिक मुद्दों को दर्शाते हैं। ये गीत कृषि से लेकर प्रेम कहानियों तक विभिन्न विषयों को कवर कर सकते हैं। लोक गीत विषय और शैली में विविध हैं। वे अक्सर सरल, दोहराव वाली धुनें और गीत प्रस्तुत करते हैं जिनके साथ गाना आसान होता है।


निम्नलिखित कुछ लोकप्रिय प्रकार के लोक गीत हैं जो उनकी मुख्य विशेषताओं के साथ पूर्वांचल में पाए जाते हैं:


सोहर गीत:

थीम: सोहर गीत बच्चे के जन्म के दौरान गाए जाते हैं और नवजात शिशु के आगमन का जश्न मनाते हैं। वे माँ और बच्चे को आशीर्वाद और शुभकामनाएँ देते हैं।

विशेषताएँ: सोहर गीत आम तौर पर मधुर होते हैं और उनमें लोरी जैसी गुणवत्ता होती है। उनके साथ ढोलक और मंजीरा जैसे साधारण संगीत वाद्ययंत्र होते हैं।


कजरी गीत:

थीम: कजरी गीत मानसून के मौसम से जुड़े हैं और काम के कारण अलग हुए प्रेमियों या परिवारों के संदर्भ में अलगाव की पीड़ा को व्यक्त करते हैं।

विशेषताएं: कजरी गीतों में उदासी और काव्यात्मक स्वर होता है। वे अक्सर बरसात के मौसम की सुंदरता और प्रियजनों की चाहत का वर्णन करते हैं।


झूला गीत:

थीम: झूला उत्सव के दौरान झूला गीत गाए जाते हैं, जहां देवताओं की मूर्तियों को झूले पर रखा जाता है और भक्त उनके चारों ओर गाते और नृत्य करते हैं।

विशेषताएं: ये गीत ढोलक और हारमोनियम जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ जीवंत और लयबद्ध हैं। वे एक उत्सवी माहौल का आह्वान करते हैं।


चैता गीत:

थीम: चैता गीत चैत्र माह (वसंत) और चैती के त्योहार से जुड़े हैं। वे अक्सर प्रकृति की सुंदरता और प्रेमियों की चंचल बातचीत को चित्रित करते हैं।


विशेषताएँ: चैता गीतों की विशेषता जीवंत और उत्साहित लय है। वे अक्सर नृत्य के साथ होते हैं और पारंपरिक वाद्ययंत्रों का उपयोग करते हैं।


कहरवा गीत:

थीम: कहरवा गीत होली जैसे त्योहारों के दौरान गाए जाते हैं और इन समारोहों के चंचल और रंगीन पहलुओं का वर्णन करते हैं।


विशेषताएं: इन गीतों में जीवंत और लयबद्ध धुन है, और इनके साथ ढोलक और तबला जैसे पारंपरिक ताल वाद्ययंत्र हैं।


बिरहा गीत:

थीम: बिरहा गीत विरह और लालसा की भावनाओं को व्यक्त करने के लिए गाए जाते हैं। वे अक्सर दुखद प्रेम कहानियाँ या प्रवास की कहानियाँ सुनाते हैं।


विशेषताएँ: बिरहा गीतों का स्वर मार्मिक एवं भावनात्मक होता है। गायक दुःख और विषाद की गहरी भावनाओं को व्यक्त करते हैं।


पूर्वांचल के लोक गीतों की विशेषता उनकी सादगी, मधुर धुन और क्षेत्र की सांस्कृतिक और कृषि परंपराओं से उनका घनिष्ठ संबंध है। वे पूर्वांचल क्षेत्र में सामाजिक समारोहों, त्योहारों और अनुष्ठानों का एक अभिन्न अंग हैं, जो क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करते हैं।


प्रश्न।

उत्तर प्रदेश की क्रांतिकारियों का भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में योगदानों का मूल्यांकन कीजिए। 

( UPPSC General Studies I, 2021)

उत्तर।

उत्तर प्रदेश के क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए अधिक कट्टरपंथी ( क्रन्तिकारी ) और उग्रवादी दृष्टिकोण अपनाकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान दिया।


भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उत्तर प्रदेश के क्रांतिकारियों के कुछ प्रमुख योगदान निम्नलिखित हैं:



काकोरी षड़यंत्र (1925):

उत्तर प्रदेश के क्रांतिकारियों से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध घटनाओं में से एक काकोरी षडयंत्र था। इसका नेतृत्व राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान और अन्य ने किया था। उन्होंने अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों को वित्त पोषित करने के लिए काकोरी में एक साहसी ट्रेन डकैती को अंजाम दिया। इस घटना ने न केवल उनके उद्देश्य की ओर ध्यान आकर्षित किया बल्कि कई भारतीयों को भी इस संघर्ष में शामिल होने के लिए प्रेरित किया।



हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचएसआरए):

हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन उत्तर प्रदेश में मजबूत उपस्थिति वाला एक प्रमुख क्रांतिकारी संगठन था। चन्द्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह और राजगुरु जैसे नेता इससे जुड़े थे। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र प्रतिरोध की वकालत की और औपनिवेशिक अधिकारियों के खिलाफ हिंसा के कई कृत्यों को अंजाम दिया।



अलीगढ आंदोलन:

उत्तर प्रदेश में अलीगढ क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र था। अलीगढ़ के स्वतंत्रता सेनानी मौलाना हसरत मोहानी ने अपने लेखन और भाषणों के माध्यम से स्वतंत्रता के उद्देश्य को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।



झाँसी और अवध विद्रोह:

झाँसी और अवध जैसे क्षेत्रों में ब्रिटिश शासन के खिलाफ स्थानीय विद्रोह देखा गया। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अपने उग्र प्रतिरोध के लिए एक प्रतिष्ठित व्यक्ति बन गईं।



कानपुर षडयंत्र (1924):

कानपुर षडयंत्र केस, जिसमें गणेश शंकर विद्यार्थी और मदन मोहन मालवीय जैसे नेता शामिल थे। उन पर क्रांतिकारी उद्देश्य के लिए व्यापक समर्थन को उजागर करते हुए ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों की योजना बनाने का आरोप लगाया गया था।


बलिदान और शहादत:

राम प्रसाद बिस्मिल और अन्य सहित उत्तर प्रदेश के कई क्रांतिकारियों ने स्वतंत्रता के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।


कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश के क्रांतिकारियों ने अधिक कट्टरपंथी और उग्रवादी दृष्टिकोण की वकालत करके भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने स्वतंत्रता के लिए व्यापक आंदोलन को गति दी और 1947 में अंततः स्वतंत्रता प्राप्ति में महत्वपूर्ण योगदान दिया।


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