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भारत की पारंपरिक कढ़ाई और उद्गम स्थल | कक्षा 5 EVS | अध्याय 8 वस्त्र — वस्तुएँ कैसे निर्मित होती हैं?

भारत की पारंपरिक कढ़ाई और उद्गम स्थल | कक्षा 5 EVS


 भारत में कढ़ाई और हस्त-सिलाई की समृद्ध परंपरा रही है।

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय संस्कृति, जलवायु, पहनावे तथा परंपराओं के आधार पर कढ़ाई की अलग-अलग शैलियाँ विकसित हुई हैं।


इस अध्याय में निम्नलिखित आठ (8) प्रकार की पारम्परिक कढ़ाइयों का उल्लेख किया गया है—


1. चिकन या चिकनकारी कढ़ाई

चिकन या चिकनकारी कढ़ाई


उद्गम:

लखनऊ, उत्तर प्रदेश


विशेषताएँ:

चिकनकारी मुख्य रूप से सूती, मलमल, रेशमी तथा शिफॉन वस्त्रों पर की जाती है।

परंपरागत रूप से हल्के रंग के कपड़ों पर सफेद धागे का उपयोग किया जाता है।

इसमें फूलों और पत्तियों की आकृतियाँ अधिक बनाई जाती हैं।

इसका उपयोग कुर्तों, साड़ियों, दुपट्टों तथा परिधान सामग्री में किया जाता है।


2. बंजारा कढ़ाई

बंजारा कढ़ाई


उद्गम:

राजस्थान


विशेषताएँ:

यह कढ़ाई बंजारा जनजाति द्वारा की जाती है।

इसमें रंग-बिरंगे धागों, शीशों, मोतियों, सीपों तथा सिक्कों का उपयोग किया जाता है।

चमकीले रंग और ज्यामितीय आकृतियाँ इसकी विशेषता हैं।

इसका उपयोग थैलों, वस्त्रों, दीवार सज्जा तथा सजावटी वस्तुओं में किया जाता है।


3. कंथा कढ़ाई

कंथा कढ़ाई


उद्गम:

पश्चिम बंगाल, ओडिशा तथा त्रिपुरा


विशेषताएँ:

पुरानी साड़ियों और कपड़ों को जोड़कर उपयोगी वस्तुएँ बनाई जाती हैं।

इसमें फूलों, पक्षियों, पशुओं तथा दैनिक जीवन के दृश्य बनाए जाते हैं।

यह कपड़ों के पुनः उपयोग और सृजनात्मकता का अच्छा उदाहरण है।



4. गोटा कढ़ाई

गोटा कढ़ाई


उद्गम:

  • राजस्थान


विशेषताएँ:

  • गोटा कढ़ाई का उपयोग विशेष रूप से विवाह और उत्सव के वस्त्रों में किया जाता है।
  • यह लहंगे, ओढ़नी और साड़ियों में बहुत प्रसिद्ध है।


5. फुलकारी कढ़ाई

फुलकारी कढ़ाई


उद्गम:

  • पंजाब


विशेषताएँ:

  • “फुलकारी” का अर्थ है “फूलों का कार्य”।
  • सूती कपड़े पर चमकीले रेशमी धागों से कढ़ाई की जाती है।
  • इसमें फूलों की आकृतियाँ और रंगीन डिज़ाइन अधिक बनाए जाते हैं।
  • फुलकारी दुपट्टे और शॉल विवाह तथा उत्सवों में विशेष रूप से उपयोग किए जाते हैं।


6. टोडा कढ़ाई

टोडा कढ़ाई


उद्गम:

  • तमिलनाडु (नीलगिरि पहाड़ियाँ)


विशेषताएँ:

  • यह कढ़ाई टोडा जनजाति द्वारा की जाती है।
  • सफेद कपड़े पर लाल और काले धागों से आकृतियाँ बनाई जाती हैं।
  • ज्यामितीय आकृतियाँ इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं।


7. कश्मीरी कढ़ाई

कश्मीरी कढ़ाई


उद्गम:

  • कश्मीर


विशेषताएँ:

  • इसमें ऊनी, रेशमी तथा पश्मीना वस्त्रों का उपयोग किया जाता है।
  • कश्मीरी कढ़ाई अपनी सुंदर और महीन कलाकारी के लिए प्रसिद्ध है।


8. खनेंग कढ़ाई

खनेंग कढ़ाई


उद्गम:

  • मेघालय


विशेषताएँ:

  • यह मेघालय की जनजातीय समुदायों द्वारा की जाती है।
  • इसमें पारंपरिक जनजातीय आकृतियाँ और रंगीन धागों का उपयोग किया जाता है।



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