मानव भूगोल में संभववाद की अवधारणा की व्याख्या कीजिए।

 प्रश्न। 

मानव भूगोल में संभववाद की अवधारणा की व्याख्या कीजिए। 

कक्षा 12: मानव भूगोल के मूल सिद्धांत, अध्याय 1 मानव भूगोल-प्रकृति एवं विषय क्षेत्र)

उत्तर।

जैसा कि हम जानते हैं, मानव भूगोल भौतिक पर्यावरण और मनुष्यों के बीच संबंधों का अध्ययन है।

पहले, जब मानव समाज आदिम था, मानव क्रियाएँ और मानव का व्यवहार ताकतवर भौतिक पर्यावरणीय शक्तियों के अधीन थे। इस प्रकार की अंतःक्रिया को हम मानव भूगोल में पर्यावरण नियतिवाद कहते हैं।


प्रौद्योगिकी की प्रगति और सामाजिक-आर्थिक विकास के साथ, आदिम समाज एक उन्नत समाज में बदल गया, इसके परिणामस्वरूप भौतिक वातावरण के साथ हमारी  संबंध भी बदल गया।

समय बीतने के साथ, मनुष्य अपने भौतिक वातावरण को समझने लगे। बेहतर सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए तथा भौतिक पर्यावरण का दोहन करने के लिए, मानव अधिक और बेहतर तकनीक विकसित करता रहा।  समय के साथ, मानव ने भौतिक वातावरण की बाधाओ को दूर किया जो आदिम समाज नहीं कर पाते थे। आज मानव अपनी सुबिधा की अनुसार , तरह हर जगह एक सांस्कृतिक परिदृश्य बनाया जैसे हाइलैंड्स पर होटल रेस्तरां बनाना , विशाल शहरी फैलाव, खेतों, बागों, और मैदानों और रोलिंग पहाड़ियों में चरागाह, तटों पर बंदरगाह, समुद्री सतह पर समुद्री मार्ग और अंतरिक्ष में उपग्रह। 


भौतिक वातावरण के साथ मनुष्यों द्वारा इस प्रकार के संबंध और अंतःक्रिया को संभववाद( संभावनावाद) कहा जाता है।


संभववाद( संभावनावाद) , मानव भूगोल के दृष्टिकोणों में से एक है जो मानता है कि प्रकृति हर जगह अवसर और संभावनाएं प्रदान करती है। संभावनाओं का दोहन करना बहुत मानवीय है। 


जो पहले मानव प्रकितिक हुआ करता था अब प्रकृति को मानवीय बना दिया। अब, रेगिस्तानी इलाकों में रहने के बावजूद लोग संतरे और सेब खाने में सक्षम हैं जो रेगिस्तान का भोजन नहीं हैं। 

प्रौद्योगिकी में प्रगति के कारण, लोग मिट्टी का उपयोग किए बिना सब्जियां उगाने में सक्षम हैं; हम सूखा क्षेत्रों में सिंचाई के माध्यम से धान की फसल उगा रहे हैं।


संभववाद( संभावनावाद) का मानना ​​​​है कि मनुष्य प्रकृति के अधीन नहीं हैं ( जो पर्यावरण नियतत्ववाद मानता था ), ना ही प्रकृति मानव को अपने अधीन बनाती है।  प्रकृति हुक्म नहीं देती बल्कि हर जगह अवसर और संभावनाएं देती है। मनुष्य अपने सुविधा के अनुसार प्रकृति को बदल सकता है।

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